By – राजेश खण्डेलवाल
07 December 2024
राजस्थान के मेवात में बालिका शिक्षा (Girls Education in Mewat) के बदलते हालातों की प्रेरणादायक कहानी है जुम्मी की, जो खुद पढ़ी-लिखी नहीं है, लेकिन उसने अपनी बेटी शबनम को पढ़ा लिखाकर जेईएन बनाया है। आर्थिक मजबूरियों के बीच ऐसा करना जुम्मी के लिए आसान नहीं था। लोगों के खूब ताने सुने और सहे भी। एक बेटा और पति को खोने के बाद भी जुम्मी ने हिम्मत नहीं हारी और उसकी मेहनत रंग लाई। आज जुम्मी मेवात में महिला सशक्तीकरण का उदाहरण बन गई है।
मेवात में शबनम फैला रही शिक्षा की रोशनी
खैरथल/अलवर (राजस्थान)। मैं पढ़ नहीं पाई, जिसका मुझे मलाल है। यह मुझे आज भी कचोटता है, लेकिन मैं बेटी को पढ़ा पाई, यह मेरे लिए गर्व की बात है। मेरी बेटी सरकारी नौकरी पाकर अपने पैरों पर खड़ी है तो अब वे भी मेरे साथ खड़े नजर आते हैं, जो कभी बेटी को पढ़ाते समय ताने भी मारते रहते थे।
ऐसा गांव मिर्जापुर की 50 वर्षीय जुम्मी ने पॉजिटिव कनेक्ट को बताया। करीब 550 परिवारों की आबादी वाला यह मिर्जापुर गांव नया जिला बने खैरथल के किशनगढ़बास ब्लॉक में आता है, जो पहले अलवर जिले का ही हिस्सा होता था। अलवर से मिर्जापुर करीब 55 किलोमीटर दूर है तो किशनगढ़बास से गांव की दूरी 19 किलोमीटर है।
पॉजिटिव कनेक्ट से बातचीत में जुम्मी बताती है कि गांव में पढ़ाई का माहौल ही नहीं था। पहले बेटियों को पढ़ाना तो दूर लोग बेटों को ही स्कूल भेजने से परहेज करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। वे बताती हैं कि मैंने बेटी को पढ़ाने की ठानी तो गांव-बस्ती में अनपढ़ लोग ऐतराज जताने लगे। तरह-तरह ही बात बनाते थे, लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी।
समझा और अमल भी किया
जुम्मी पॉजिटिव कनेक्ट को बताती हैं कि एक बार अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान (AMIED) के मैम्बर सचिव नूर मोहम्मद ने गांव में सर्वे कराया और बेटियों को पढ़ाने के लिए गांव वालों को समझाने का प्रयास किया। लोगों ने उनकी बात को सुना तो सही, लेकिन समझा नहीं। मैंने उनकी बात को ना केवल समझा, बल्कि उस पर अमल भी किया। उनके सहयोग से बेटी शबनम को सर्व शिक्षा अभियान के तहत ब्रिज कोर्स से 5वीं कक्षा की पढ़ाई कराई और उसका सरकारी स्कूल में दाखिला कराया।
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लोगों की दुआएं पाकर मिलता सुकून
JEn बन चुकी शबनम पॉजिटिव कनेक्ट को बताती हैं कि 10वीं तक पढ़ाई मैंने गांव में ही की। उसके बाद मैंने इलैक्ट्रोनिक्स में डिप्लोमा किया। चूंकि इलैक्ट्रोनिक्स में स्कोप ज्यादा नहीं था तो फिर मैंने सिविल में डिप्लोमा किया। इसके बाद वर्ष 2018 में मैंने बीटेक किया। मैं अब अलवर जिले की रामगढ़ पंचायत समिति में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत हूं। खुद के पैरों पर खड़े संबंधी सवाल के जवाब में पॉजिटिव कनेक्ट को शबनम बताती हैं कि अब बहुत अच्छा महसूस होता है और सिर पर हाथ रखकर दुआएं देते हैं तो मुझे सुकून भी महसूस होता है। पॉजिटिव कनेक्ट से चर्चा में जेईएन शबनम बताती हैं, वर्ष 2013 में हुए एक एक्सीडेंट में भाई चल बसा तो वर्ष 2017 में ब्लड कैंसर के कारण पिता फेज मोहम्मद (फेजू) का इंतकाल हो गया, लेकिन मैंने और मेरी मां ने हिम्मत नहीं हारी।
समय के साथ आने लगा बदलाव
उन दिनों को याद करके भावुक हुई शबनम कहती है कि अगर मां हिम्मत हार गई होती तो आज मैं यहां तक नहीं पहुंच पाती। मां जुम्मी उन दिनों में भी मेरा हौंसला बढ़ाती रहती और कहती थी कि खुदा को जो मंजूर था, वह हो गया। अब आगे अपने लक्ष्य पर ध्यान दे बेटी। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जेईएन शबनम पॉजिटिव कनेक्ट को बताती है कि जिन संकटों को सामना मैंने किया है, ऐसा किसी और बहन-बेटी को नहीं सहना पड़े। वह कहती हैं कि अब समय बदल गया है। मुस्लिम समुदाय में भी लोग बालिकाओं को पढ़ाने के लिए आगे आने लगे हैं।
बालिकाओं को करती हूं प्रेरित
जेईएन सबनम बताती हैं, मेरी सफलता के पीछे अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान के नूर मोहम्मद का बड़ा योगदान है। एक सवाल के जवाब में वे कहती हैं कि जब भी मौका मिलता है मैं अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान के कार्यक्रमों में शामिल होती हूं। अन्य बहनों को भी पढऩे के लिए प्रेरित करती हूं, क्योंकि बिना शिक्षा के कुछ कर पाना मुश्किल है। वे बताती हैं कि फील्ड डयूटी के दौरान जिस गांव में जाना होता है, वहां भी समय मिलने पर बालिका शिक्षा (Girls Education) के लिए ग्रामीणों को जागरूक करने का प्रयास जरूर करती हूं।
मेवात पढ़ेगा तभी आगे बढ़ेगा
अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान (AMIED) के सदस्य सचिव नूर मोहम्मद बताते हैं कि पिछले दो दशक के दौरान में मेवात में शिक्षा के प्रति लोगों का नजरिया बदला है। मुस्लिम समुदाय में लोग अब दीनी तालीम के साथ औपचारिक शिक्षा पर भी ध्यान देने लगे हैं। वे बताते हैं कि संस्थान के जरिए हमारी टीम भी मेवात में बालिका शिक्षा (Girls Education) को बढ़ावा देने का सतत प्रयास कर रही है। हमारा मानना है कि मेवात पढ़ेगा, तभी आगे बढ़ेगा। वे बताते हैं कि ऐसी कई बालिकाएं हैं, जिनको पढ़ाने का सौभाग्य हमें मिला और आज वे आत्मनिर्भर बनी हैं। एक सवाल के प्रतिउत्तर में वे पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि बेटी के पढकऱ आगे बढऩे से ज्यादा खुशी और क्या हो सकती है? नूर मोहम्मत गर्व करते हुए पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि शबनम अपने किशनगढ़बास ब्लॉक से मुस्लिम समुदाय की पहली और एकमात्र जेईएन है, जिस पर समाज को भी नाज है।
साकार किया बालपन का सपना
अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान (AMIED) में शुरूआत से जुड़ी डिप्टी डायरेक्टर आशा नारंग पॉजिटिव कनेक्ट को बताती हैं कि आर्थिक मजबूरियों के कारण कई बार शबनम की मां जुम्मी की आंखें नम हो जाती थी, लेकिन दोनों मां-बेटी हिम्मत की धनी हैं। वे बताती हैं कि शबनम जब छोटी थी तो बकरियां भी चराती थी। वह जब 7वीं-8वीं में पढऩे लगी तो किसी के भी पूछने पर वह सिर्फ यही कहती कि उसे इंजीनियर बनना है, जबकि इंजीनियर क्या होता है यह वह जानती तक नहीं थी, लेकिन ज्यों-ज्यों समझदार हुई तो उसने अपने बालपन के सपने को साकार करने की ठान ली और आज जेईएन बनकर वह सपना पूरा करके दिखा भी दिया।